पिथौरागढ़। अपनी कार्यशैली को लेकर चर्चित रहे आईपीएस लोकेश्वर सिंह पर अब कानून का शिकंजा कसना शुरू हो गया है। कानून को अपने जूते के नीचे रोधने वाले पिथौरागढ़ के पूर्व पुलिस अधीक्षक **लोकेश्वर सिंह** के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। अपनी ‘तुनकमिजाजी’ और ‘शहंशाही’ अंदाज के लिए चर्चाओं में रहने वाले पूर्व कप्तान साहब के सितारे अब गर्दिश में हैं। आज उसी कानून ने उनके गिरेबान तक हाथ डाल दिया है।
**साहबी गई, पर अकड़ नहीं?**
चर्चा तो यह भी है कि लोकेश्वर सिंह ने अपनी आईपीएस (IPS) की नौकरी को अलविदा कह दिया है। लेकिन साहब को शायद यह गलतफहमी थी कि इस्तीफा देने से पुराने ‘गुनाहों’ की फाइलें बंद हो जाती हैं। पिथौरागढ़ की वादियों में आज भी उनके उस रौब की चर्चा होती है, जहाँ फरियादी की गुहार से ज्यादा साहब के मूड की अहमियत होती थी। लेकिन **मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) संजय सिंह** की अदालत ने साफ कर दिया है कि इंसाफ की तराजू में वर्दी का वजन नहीं, बल्कि सच्चाई का दामन देखा जाता है।
माननीय न्यायालय ने **श्री लक्ष्मी दत्त जोशी बनाम लोकेश्वर सिंह** मामले (वाद संख्या 99/2026) की सुनवाई करते हुए साहब के ‘सिस्टम’ को हिलाकर रख दिया है। कोर्ट ने कोतवाली पिथौरागढ़ को दो टूक शब्दों में निर्देश दिया है: **”FIR दर्ज करो और जांच शुरू करो!”**
**इन धाराओं में फंसे पूर्व कप्तान:**
कोर्ट के आदेश ने उन धाराओं की झड़ी लगा दी है, जो किसी भी रसूखदार की नींद उड़ाने के लिए काफी हैं:
* **मारपीट और बेइज्जती:** धारा 323, 342 और 355।
* **धमकी और गाली-गलौज:** धारा 504 और 506।
* **लूटपाट और साजिश:** धारा 392 और 120(बी)।
### **जनता की जीत, तुनकमिजाजी की हार**
इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि लोकतंत्र में ‘तानाशाही’ के लिए कोई जगह नहीं है। लोकेश्वर सिंह की जिस कार्यशैली को लोग उनकी व्यक्तिगत पसंद मानकर बर्दाश्त कर रहे थे, अदालत ने उसे ‘अपराध’ की श्रेणी में खड़ा कर दिया है। इससे पहले पुलिस प्राधिकरण की ओर से भी उनके खिलाफ सख्त आदेश जारी किया गया था हालांकि आदेश का पालन होता उससे पहले ही वह नौकरी से इस्तीफा दे चुका है
