गालीबाज कप्तानों का मित्र पुलिस को रिटर्न गिफ्ट ,जूनियर को जमकर दी गलियां बड़ों ने फेरा मुँह ओर हो गया इंसाफ। करना पड़ा जूनियर को अपना तबादला

देहरादून/उत्तराखंड: देवभूमि की *’मित्र पुलिस’* अब कितनी *’मित्र’* रह गई है, इसका जीता-जागता उदाहरण सूबे के दो जिलो से निकलकर आ रहा है। यहाँ *’मित्रता’* का मतलब शायद अब *’जूनियर को गाली दो और उनका ट्रांसफर करवाओ’* हो गया है। चर्चा गरम है कि दो कप्तानों अनुशासन की ऐसी ‘नई परिभाषा’ लिखी है कि बेचारे जूनियर ऑफिसर अब जिले में काम करने से ज्यादा अपनी इज्जत बचाने की चिंता कर रहे हैं।

*गाली ‘प्रसाद’ में मिली, और इनाम में मिला ट्रांसफर!*

कहावत है कि गलती करने वाले को सजा मिलती है, लेकिन उत्तराखंड पुलिस के इन दो जिलों में शायद नियम बदल गए हैं। सूत्र बताते हैं कि इन दोनों साहबों ने अपने जूनियर्स पर शब्दों के ऐसे ‘बाण’ छोड़े कि मर्यादा तार-तार हो गई। गाली-गलौज और बदतमीजी का आलम यह था कि जूनियर्स ने काम करने के बजाय हाथ जोड़कर वहां से निकलना ही बेहतर समझा।

मजे की बात देखिए—इंसाफ की उम्मीद में जब ये पीड़ित अधिकारी अपने ‘बड़े साहबों’ के पास पहुंचे, तो वहां उन्हें ‘मौन व्रत’ का दर्शन हुआ।

सीनियर अधिकारियों ने इन ‘दबंग’ कप्तानों को समझाने की जहमत तक नहीं उठाई, बल्कि चुपचाप उन्हीं जूनियर अधिकारियों का बिस्तर गोल कर दिया जिन्हें गाली पड़ी थी।
इसे कहते हैं— “करे कोई, भरे कोई!”
*’मित्र पुलिस’ या ‘गिरेबान पकड़’ पुलिस?*

उत्तराखंड पुलिस का स्लोगन है— *’मित्र पुलिस’।*
लेकिन अब जनता और महकमे के भीतर ही लोग दबी जुबान में पूछ रहे हैं कि क्या यह मित्रता सिर्फ पोस्टरों तक सीमित है? विभाग के भीतर जिस तरह का माहौल इन दो जिलों में बना, उसने ‘मित्र पुलिस’ के नाम को अब कुछ *’चटपटे’* और *’विवादित’* उपनामों से नवाजना शुरू कर दिया है। जैसा टिहरी से सोशल मीडिया से शुरू हुआ।

लोग कहने लगे हैं कि अगर अपनों के साथ यह हाल है, तो आम जनता के साथ तो *भगवान ही मालिक* है।

*गलती छिपाने का ‘मास्टर स्ट्रोक’*

चर्चा तो यह भी है कि अपनी गलतियों पर पर्दा डालना और दूसरों को बलि का बकरा बनाना इन कप्तानों की पुरानी आदत है। सिस्टम में अपनी पैठ का ऐसा इस्तेमाल कि गाली भी दो और सामने वाले को ही मुजरिम बनाकर जिले से बाहर फिंकवा दो—यह किसी फिल्मी विलेन के स्टाइल से कम नहीं है।

*अगर जिले में टिकना है, तो गाली सुनने की आदत डालो, वरना झोला उठाओ और चलते बनो।*

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